Saturday, 14 January 2012

जन लोकपाल: ``सुपरकॉप´´ नहीं ``सुपरहिट´´ होगा


कुछ लोग भ्रम फैलाने में लगे हैं कि जनलोकपाल एक ``सुपरकॉप´´ यानि एक सर्वशक्तिमान संस्था बन जाएगा जो लोकतन्त्र कमज़ोर करेगा 
 
तो क्या हम एक कमज़ोर लोकपाल चाहते हैं जो भ्रष्टाचारियों के सामने गिड़गिड़ाता रहे कि भाई अपना भ्रष्टाचार हमें बता दो?

संसदीय लोकतन्त्र में चुने हुए प्रतिनिधियों की गरिमा और महत्व सर्वोपरि रहना चाहिए। प्रस्तावित जनलोकपाल कानून में इसे कम करने का कोई सवाल ही नहीं उठता। वस्तुत: लोकपाल का अर्थ ही है लोकतन्त्र की पालना कराने वाला। प्रस्तावित जनलोकपाल बिल के ड्राफ्ट 2.2 (देखने के लिए क्लिक करें ) और उसके बाद मिल रहे सुझावों के आधार पर तैयार प्रमुख बिन्दुओं को अगर ज़रा भी ध्यान से देखेंगे तो समझ आ जाता है कि यह कानून लोकपाल को नहीं बल्कि देश के आम आदमी को ताकतवर बनाता है। 

चाहे लोकतन्त्र हो या कोई और तन्त्र, कुल मिलाकर लोगों के लिए है, किसी अंध्विश्वास का नाम लोकतन्त्र नहीं है। अगर किसी तन्त्र में अपनाई गई परम्पराओं ने लोगों को कमज़ोर किया है तो उन्हें ठीक करते हुए लोगों को और ताकतवर बनाने की ज़रूरत है। क्योंकि कोई भी तन्त्र आखिरकार है तो लोगों के लिए ही। दुर्भाग्य से हमारे लोकतन्त्र में एक सांसद, विधायक खुद को जनता का मालिक समझता है। अगर वह मंत्री हो गया तो खुद को खुदा समझने लगता है। जनता के टैक्स के पैसे पर पलने वाला पूरा का पूरा तन्त्र आम आदमी को शोषित कर रहा है। इसकी बानगी के लिए देश के दूरदराज़ के इलाकों तक जाने की ज़रूरत नहीं है। चमचमाती दिल्ली में हर सरकारी दफ्तर के सामने इस तरह के लोग मिल जाएंगे जो इस तन्त्र के खुदा बन जाने के शिकार हैं। इस तन्त्र में बैठे लोगों की मनमानी और भ्रष्टाचार की बदौलत आज आम आदमी लोकतन्त्र में विश्वास खोता जा रहा है। 


तो कहने का मतलब यह है कि लोकतन्त्र को कमज़ोर करने का काम भ्रष्ट अफसर और नेता कर रहे हैं। उनके सामने लोगों की एक नहीं चलती। लोग सिर्फ भिखारी बनकर रह गए हैं। गांव के गरीब को मिलने वाले राशन और पेंशन वगैरह भी इस तरह दिए जाते हैं मानो नेताजी और सरकारी क्लर्क उस पर अहसान कर रहे हों। गरीबों के लिए बनी एक भी योजना भ्रष्टाचार के चलते सफल नहीं हो पा रही। जनलोकपाल कानून बनने के दो साल के अन्दर देश के बहुत से नेता और अफसर जेल की हवा खा रहे होंगे और आम लोगों के पासपोर्ट, ड्राइविंग लाईसेंस जैसे काम बिना रिश्वत के हो रहे होंगे। भ्रष्टाचार ने आज पूरे देश की खुशहाली छीन ली है। अफसर और नेताओं को पैसा खिलाकर बड़ी बड़ी कम्पनियां किसानों को खेती से बेदखल कर रही हैं। व्यापारियों का कोई काम बिना रिश्वत खिलाए नहीं होता। हर ठेके में कमीशन काम की लागत से अधिक हो गया है। गांव से आने वाले लोगों से तो सरकारी दफ्तरों में ठीक से बात तक नहीं की जाती। 

बड़े घोटालेबाज़ों को जेल भेजना हो या जनता से रिश्वत मांगने वाले अधिकारीयों पर दण्ड लगाना हो, इसके लिए जनलोकपाल का आना ज़रूरी है। जनलोकपाल कानून एक अहम कदम होगा आम आदमी को मजबूत करने की दिशा में। 

जनता द्वारा तैयार जन लोकपाल बिल लागू होने से -
 यदि आज हमारा कोई काम तय समय सीमा में नहीं होता है तो दोषी अधिकारी पर ज़ुर्माना लगया जाएगा और मुआवज़े के रूप में हमें दिलवाया जाएगा।
अगर हमारा राशनकार्ड, वोटर कार्ड, पासपोर्ट तय समय सीमा में नहीं बनता है या पुलिस शिकायत दर्ज नहीं करती है तो आज हमारी शिकायत कहीं नहीं सुनी जाती। जन लोकपाल कानून बनता है तो न सिर्फ हमारा काम कराया जाएगा बल्कि दोषी अधिकारी पर एक महीने में एक्शन भी लिया जाएगा।
राशन की कालाबाज़ारी, सड़क बनाने में घोटाला, पंचायत निधि का दुरुपयोग, स्कूल अस्पताल आदि में भ्रष्टाचार से लेकर बड़े बड़े घपलों घोटालों की शिकायत हम सीधे लोकपाल को कर सकेंगे। हमारी शिकायत पर ज्यादा से ज्यादा एक साल में जांच पूरी करनी होगी और दोषी व्यक्ति को अगले एक साल के अन्दर जेल भेजा जाएगा।
जनता की मेहनत की कमाई को लूट लूटकर अपना घर भरने वाले लोगों के भ्रष्टाचार से हुए नुकसान की वसूली भ्रष्ट लोगों से की जाएगी।

ये लोकपाल अपना काम ठीक से कर सकें इसके लिए कुछ बातें ज़रूरी हैं - 
ये एकदम स्वतन्त्र होनी चाहिए। यानि नेता और अफसर इनके ट्रांसफर आदि न करवा सकें
नेताओं और अफसरों की जांच का अधिकारी एक ही एजेंसी, यानि लोकपाल के पास हो। अभी यह अलग अलग होती है।
किसी भ्रष्ट नेता या अफसर की जांच के लिए उन्हें उसी के बॉस से इजाज़त लेने की मजबूरी नहीं होनी चाहिए। 
लोकपाल के पास आने वाले मामलों की संख्या के आधार पर स्पेशल कोर्ट के जजों की नियुक्ति हो ताकि एक साल में दोषियों को जेल भेजा जा सके। 
किसी अधिकारी या नेता के भ्रष्टाचार के चलते देश को हुए नुकसान की वसूली उसके और उसके परिवार की सम्पत्ति बेचकर की जानी चाहिए। 

केन्द्र सरकार पिछले 42 साल से इस कानून को लाने का झांसा दे रही है। इसलिए ज़रूरी है कि हम सब मिलकर सरकार को बाध्य करें कि वह जनता द्वारा तैयार जनलोकपाल के में कही बातों के अनुसार ही कानून बनाए।

प्रचार किया जा रहा है कि जनलोकपाल कानून बन गया तो हमारी लोकतान्त्रिक संस्थाएं कमज़ोर पड़ जाएंगी। तर्क दिया जा रहा है कि लोकपाल जनता की चुनी हुई संसद और सरकार के ऊपर कैसे हो सकता है। 

जनलोकपाल में लोकतन्त्र के कमज़ोर होने का राग अलाप रहे लोगों को यह भी समझना होगा कि लोकतन्त्र एक व्यवस्था को कहा जाता है, धन, पैसे और राजनीतिक कृपा के दम पर कुर्सियों से चिपक गए लोग लोकतन्त्र नहीं होते। एक अच्छा जनलोकपाल कानून बनेगा तो ऐसे लोगों के भ्रष्टाचार करने की ताकत कम होगी। आम आदमी का शोषण करने की ताकत कम होगी। 

जनलोकपाल कानून, आज़ाद भारत का शायद पहला ऐसा कानून जो बनने से पहले ही इतना लोकप्रिय हो गया हो और जिसके बनने में इतनी जनचर्चा हुई हो। एक तरफ सरकार की 10 सदस्यीय समिति, जिसमें 5 केन्द्रीय मंत्री और 5 समाजसेवी लोग शामिल हैं, लगभग हर सप्ताह माथापच्ची कर रही है। दूसरी तरफ इस कानून के लिए जनान्दोलन खड़ा करने वाले समाजसेवी अन्ना हज़ारे और उनके साथी देश के कोने कोने में जाकर, समाज के हर वर्ग के साथ चर्चा कर रहे हैं। इतनी जनचर्चा, इतने लोगों के सुझाव शायद ही किसी कानून के बनने में लिए गए हों। देश की जनता बड़ी उम्मीद के साथ इस कानून को बनवाने के काम में जुटी है। याद रहे कि चन्द लोगों की किताबी बहस में हम जनता की उम्मीद ना तोड़ दें।

Friday, 30 December 2011

क्या जन लोकपाल दफ्तर में भ्रष्टाचार नहीं होगा?



दो महीने में सख्त कार्रवाई
अगर लोकपाल या लोकायुक्त के किसी स्टाफ के खिलाफ कोई भ्रष्टाचार की शिकायत आती है तो उस शिकायत को लोकपाल में किया जायेगा और उसके ऊपर एक महीने में जांच पूरी होगी और अगर जांच के दौरान उस स्टाफ मैम्बर के खिलाफ अगर कोई सबूत मिलता है तो उस स्टाफ को अगले एक महीने में नौकरी से सीधे निकाल दिया जायेगा ताकि वो जांच को बेईमानी से न करे।

कामकाज पारदर्शी होगा
लोकपाल के अन्दर की काम-काज की प्रक्रिया को पूरी तरह से पारदर्शी बनाने के लिये इसमें लिखा गया है। जब जांच चल रही होगी तब जांच से सम्बंधित सारे दस्तावेज़ भी पारदर्शी होने चाहिए। लेकिन ऐसे दस्तावेज़ जिनका सार्वजनिक होना जांच में बाधा पहुंचा सकता है, उन्हें तब तक सार्वजनिक नहीं किया जाएगा जब तक कि लोकपाल ऐसा समझता है। लेकिन जांच पूरी होने के बाद किसी भी केस में सारे दस्तावेज़ उस जांच से सम्बंधित वेबसाइट में डालने जरूरी होंगे। ताकि जनता ये देख सकें कि इस जांच में हेरा फेरी तो नहीं हुई। 
दूसरी चीज, हर महीने लोकपाल / लोकायुक्त को अपनी वेबसाइट पर लिखना पड़ेगा कि किस-किस की शिकायतें आईं, किस-किस के खिलाफ आई मोटे-मोटे तौर पर शिकायत क्या थी, उस पर क्या कार्यवाई की गई, कितनी पेण्डिंग है, कितने बन्द कर दी गई, कितने में मुकदमें दायर किये गये, कितनों को नौकरी से निकाल दिया गया या क्या सज़ा दी गई ये सारी बातें लोकपाल / लोकायुक्त को अपनी वेबसाइट पर रखनी होंगी।

शिकायतों की सुनवाई जरूरी 
कई बार देखने में आया कि जांच ऐजेंसी के अधिकारी शिकायतों पर कार्यवाही नहीं करते और सेटिंग करके जांच को बन्द कर देते है। और जो शिकायतकर्ता है उसको कुछ भी नहीं बताया जाता कि जांच का क्या हुआ। इसीलिए यहां के कानून में यह प्रावधान डाला गया है कि किसी भी जांच को बिना शिकायतकर्ता को बताए बन्द नहीं किया जायेगा। हर जांच को बन्द करने के पहले शिकायतकर्ता की सुनवाई की जायेगी और अगर जांच बन्द की जाती है तो उस जांच से सम्बंधित सारे कागज़ात खुले पब्लिक में वेबसाईट पर डाल दिये जायेंगे ताकि सब लोग देख सकें कि जांच ठीक हुई है या नहीं।

Wednesday, 28 December 2011

लोकपाल कोई भी बने, उसका उदघाटोन का लिए हामको जोरूर बुलाये

पहले बातें हुई कि लोकपाल आना चाहिए. हील-हुज्ज़त के बाद यह बात शुरू हुई कि लोकपाल आ रहा है. एक बार लगा भी कि अब आ ही जाएगा लेकिन फिर लगा कि शायद आने में देरी है. महत्वपूर्ण लोगों को आने में देरी होती ही है और आज की तारीख में लोकपाल से महत्वपूर्ण कौन है? फिर इस मुद्दे पर बहस शुरू हो गई कि जो लोकपाल आएगा वह कमज़ोर हो कि मज़बूत? जबतक कुछ लोग़ कमज़ोर लोकपाल चाहते थे तबतक उसके आने की उम्मीद बनी हुई थी. समस्या तब से शुरू हुई जबसे इस मुद्दे से जुड़े सभी पक्ष मज़बूत लोकपाल लाना चाहते हैं. 

अब लगता है कि लोकपाल आज के ज़माने की मूंगफली बनकर रह गया है. यानि टाइम-पास. 

खैर, अब तक लगभग सभी जगह बहस हो चुकी है. रतीराम जी की पान-दुकान, बस, लोकल ट्रेन, फेसबुक, ट्विटर, गूगल-प्लस, से लेकर सर्वोपरि पार्लियामेंट तक में बहस हो चुकी है. कल किसी पाठक ने याद दिलाया कि मेरे ब्लॉग पर लोकपाल जैसे महतवपूर्ण मुद्दे पर बहस नहीं हुई है. वे मुझे धिक्कारते हुए बोले; "अगर इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर बहस नहीं करवा सकते तो ब्लागिंग में काहे झक मार रहे हैं."

आप में से जो ब्लॉगर हैं, उन्हें पता होगा कि एक ब्लॉगर का ईगो कितना बड़ा होता है. उधर हमारा ईगो हर्ट हुआ और इधर मैंने चंदू को भेज दिया लोकपाल के मुद्दे पर तमाम लोगों के बयान लेने. आप पढ़िए कि लोगों ने क्या कहा?

हरभजन सिंह : "आई वांट लोकपाल टू मेक इट लार्ज. मैं तो जी मानता हूँ कि लोकपाल बने और बड़ा बने. छोटे लोकपाल से क्या फायदा? मैं तो यह चाहूँगा कि जो भी लोकपाल हो, ही शुड स्ट्राइक ऐट रूट ऑफ करप्शन. कहने का मतलब ये कि स्ट्राकिंग लोकपाल हो. बिलकुल मेरी तरह जैसे मैं इंडियन टीम का स्ट्राकिंग बॉलर हूँ."

कपिल सिबल : "(मुस्कुराते हुए) लोकपाल लाने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए. लोकपाल के बारे में डिस्कशन हमें जीरो से शुरू करना चाहिए. आप जानते ही होंगे कि कोई बात जब जीरो से शुरू होती है तो बड़ा फायदा होता है. सोनिया जी भी चाहती हैं कि एक मज़बूत लोकपाल आये. बहस के बाद जब भी लोकपाल बिल संसद में पास हो जाए तो मैं चाहूँगा कि सरकार के पास ये अधिकार रहे कि जो भी लोकपाल बने उसके बोलने या कुछ करने से पहले उसके दिमाग की स्कैनिंग कर सके. एकबार स्कैनिंग हो जाए तो फिर हम उन्ही बातों को उनसे बोलने के लिए कहेंगे जो हम चाहते हैं. मैं आई टी मिनिस्टर भी हूँ और मैंने कई टेक कंपनियों के रीप्रजेंटेटिव की एक मीटिंग की है. मैंने उनसे कहा है कि वे सजेस्ट करें कि लोकपाल की सोच और उनके काम की प्री-स्क्रीनिंग कैसे की जाए? अगर ये कम्पनियाँ हमारे साथ को-ऑपरेट नहीं करतीं तो फिर हम कोर्ट जायेंगे. "

प्रनब मुखर्जी : "ऐज आभार पार्टी हैज सेड आर्लियर आल्सो, उइ आल उवांट ए स्ट्रांग लोकपाल.. बाट ऐज इयु नो, डियु टू रेसेसोन ईन एयुरोप, ईट हैज रियाली बीकोम डिफिकोल्ट टू शासटेन ऐंड ब्रींग लोकपाल ऐज पार पीपुल्स च्वायस. बाट उइ स्टील बिलीभ दैट साम डे, स्पेसोली हुएन इन्फलेशोंन ईज कोंट्रोल्ड, उइ उविल बी एभुल टू ब्रींग ए स्ट्रांग लोकपाल."

लालू जी : "आ पहले बात सुनो आगे ही भकर-भकर मत बोलो. सूनो.. आ ई आना जो हैं देश के खिलाफ साजिश कर रहे हैं. आई भिल टेल नेशन... ई लोग़ सब सड़क पर बैठ के बिल बनना चाहता है लोग़. संसद जो है, ऊ सर्वोपरि है. ई सब आर एस एस वाला जो है सब आना के भड़काता है लोग़. हमलोग ऐज अ रिस्पेक्टेड लीडर का करप्शन नहीं मिटाना चाहते? आ फिर, का ज़रुरत है स्ट्रोंग लोकपाल का? हमको बताओ. लोकपाल जो है सो उ दूध का माफिक रहना चाहिए. जहाँ ढाल दिए, उहाँ ढल गया. तब न जाके अपना काम कर पायेगा. असली लोकपाल जो है सो दलित के बारे में सोचेगा..भीकर सेक्शन आफ सोसाइटी के बारे में सोचेगा...हमारे मुस्लिम भाइयों के बारे में सोचेगा...सीख भाइयों के बारे में सोचेगा..आ सुनो, हीन्दू, मुस्लिम, सीख, ईसाई, आ, आपस में हैं सब भाई-भाई.."

मुलायम जी : "देखिये सुइए..क्या है ये लोकपा? ये जो है वो एक तईका है... दओगा-आज लाने का तईका है ये. ओकपाल आ जाने से, अच्छे ओग आजनीति में आना बंद क देंगे. अखियेश ने हमें बताया है. सवोच्च-न्यालय को भी ये ओग चाहते हैं कि न्यालय भी लोकपा के अधीन ओ जाए..ऐसा संभव नहीं है..बात मानिए हमाई..ये ओकपाल का आना लोकतंत्र के इए खतरा है. सका को चाहिए कि ऐसा कदम न उहाये. वियोध कयेंगे हम सका के इस कदम का."

सुब्रमनियम स्वामी : "मेरे पास सुबूत हैं कि लोकपाल के मुद्दे पर चिदंबरम और सिबल के बीच कुल पाँच मीटिंग्स हुई थी और दोनों ने डिसाइड किया था कि फर्स्ट कम फर्स्ट सर्व बेसिस पर लोकपाल का अप्वाइंटमेंट होगा. चिदंबरम भले ही कहें कि ऐसी कोई मीटिंग नहीं हुई लेकिम मेरे पास इसका सुबूत है. मिनट्स ऑफ मीटिंग्स भी हैं. मैं जल्द ही ट्वीट करके बताऊंगा कि मैं आगे क्या करने वाला हूँ. जहाँ तक यह बात है कि लोकपाल कैसा रहे तो मेरे विचार से हमें एक विराट लोकपाल के गठन की कोशिश करनी चाहिए. इसी से करप्शन को दूर किया जा सकेगा."

प्रधानमंत्री जी : "




."

अरनब गोस्वामी : "दिस चैनल इज गोइंग तो आस्क सम टफ क्वेश्चंस टूनाईट एंड वी विल मेक इट स्योर दैट द इश्यू ऑफ लोकपाल इज नॉट पोलिटिसाइज्ड. वी अस्योर आर व्यूअर्स दैट वी आर ऑन ओउर हाइ-वे टू सीक द ट्रुथ एंड....

विनोद दुआ : "सभी यह चाहते हैं कि लोकपाल आये और एक मज़बूत लोकपाल आये परन्तु प्रश्न यह है कि लोकपाल के आने के बाद क्या नरेन्द्र मोदी को अपने किये पर शर्म आएगी? क्या वे राष्ट्र से माफी मांगेंगे? हजारों लोगों की हत्या की जिम्मेदारी जिनके ऊपर है उन्हें क्या लोकपाल सज़ा दिला पायेगा? अगर लोकपाल के आने के बाद भी नरेन्द्र मोदी को सज़ा नहीं मिलेगी तो फिर मुझे समझ नहीं आता कि ऐसा लोकपाल किस तरह भारत के हित में है. आप इसपर विचार करें तब तक हम सुनते हैं मुकेश का गाया गीत. फिल्म का नाम है पहली नज़र. गाने के बोल हैं; "दिल जलता है तो जलने दो..." गीतकार हैं आह सीतापुरी और संगीत अनिल विश्वास का है..."

शाहरुख़ खान, उर्फ़ डान -२ : "लोकपाल का आना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है. हे हे हे हे हे.."

किरण बेदी : "ये देश के साथ अन्याय है. जिस तरह से सरकार ने लोकपाल के मुद्दे पर पूरे देश के साथ धोखा किया है हम उसे जनता के बीच लेकर जायेंगे. अभी तक तो हम ये मांग करते रहे हैं कि लोकपाल मज़बूत होना चाहिए लेकिन अब हम उनमें एक और मांग जोड़ देंगे कि लोकपाल ऐसा होना चाहिए जो अन्ना की तरह ही अनशन कर सके. हम तब तक नहीं बैठेंगे जबतक..."

रजत भंडारी, आई ए एस, चीफ सेक्रेटरी, सेंट्रल पब्लिक प्रोक्योरमेंट कमिटी : "मैं तो चाहूँगा कि देश को सही लोकपाल मिले उसके लिए हमें इसी वित्तवर्ष के मार्च महीने में लोकपाल सप्लाई का एक ग्लोबल टेंडर फ्लोट करना चाहिए. ऐसा करने से देश को मजबूत, कम्पीटेटिव और सस्ता लोकपाल मिलेगा...."

माननीय अमर सिंह जी : "कोई ज़रूरी नहीं कि देश में भ्रष्टाचार का खात्मा लोकपाल ही कर सकता है. मैं खुद भ्रष्टाचार ख़त्म कर सकता हूँ. अगर माननीय प्रधानमंत्री और सोनिया जी कहें तो मैं इस दिशा में काम करने के लिए तैयार हूँ. लोकतंत्र में मतभेद के लिए स्थान है. दरअसल मैंने सिंगापुर जाकर इलाज कराने के बहाने जो जमानत ली, वह भ्रष्टाचार मिटाने के लिए ही ली. ताकि मैं स्टैडिंग कमिटी की मीटिंग में हिसा ले सकूँ और देश से भ्रष्टाचार मिटा सकूँ. ये अलग बात है कि मैं पूरी तरह से स्वस्थ हूँ और घूम-फिर कर रैली भी कर रहा हूँ लेकिन बेसिक बात यही है कि मैं भ्रष्टाचार मिटाने में सक्षम हूँ."

एस एम कृष्णा : "पुर्तगाल की जनता एक सशक्त लोकपाल चाहती है और हमारी सरकार उन्हें एक सशक्त लोकपाल देने के लिए प्रतिबद्ध है."

ममता बनर्जी : "ये देश में जो कारप्शोंन है सोब लेफ्ट-फ्रोन्ट का बाजाह से हुआ है. किन्तु आब सोरकार सोतर्क हो गया है. अब लेफ्ट बेंगोल में भी नहीं रहा. सो, हाम तो एही कहेगा कि भ्रोष्टचार आब खोतोम होगा. किन्तु हाम इसका बास्ते एफ डी आई नहीं आने देगा... हाम तो प्रोधानमोंत्री से कहूँगी कि लोकपाल कोई भी बने, उसका उदघाटोन का लिए हामको जोरूर बुलाये. "

और लोगों की प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा है. आने पर लगा दी जायेंगी. तब तक इतना बांचकर एक नई बहस छेड़ी जाय:-)

देश बदलना है तो गाँव को बदलना होगा



हम हमेशा कहते हैं कि लोकपाल कानून बनने से ही भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा। इससे भ्रष्टाचार पर नियंत्रण लगेगा। महात्मा गांधी कहते थे कि देश बदलने के लिए आपको गांव बदलना होगा। जब तक गांव नहीं बदलेगा तब तक देश नहीं बदलेगा। गांव को बदलने के लिए गांव के आदमी को बदलना पड़ेगा। गांव के लोगों को बदलना पड़ेगा। लेकिन बहुत-से लोगों को लगता है कि गांव को बदलने का मतलब है आदर्श गांव बनाना यानी पंचायत की बिल्डिंग बनाना, घरों की ऊंची-सी बिल्डिंग बनाना, रास्ते पक्के बनाना। लोग सोचते हैं कि इतना हो गया तो आदर्श गांव बन गया। आदर्श गांव की यह संकल्पना नहीं है। यह भी करना है लेकिन ऊंची-ऊंची बिल्डिंग खड़ी करना आदर्श गांव की संकल्पना नहीं है। जरूरत है तो यह भी करना है लेकिन इतने से ही आदर्श गांव बन जाएगा, ऐसा नहीं है।
 

हर आदमी जब यह सोचेगा कि अपने पड़ोसी, गांव, समाज, देश के लिए भी कुछ कर्तव्य है। जब ऐसी भावना का निर्माण गांव में होगा तभी आदर्श गांव बनेगा। जब तक लोगों के दिल में सामाजिकता नहीं आएगी तब तक ये रास्ते, जमीन और बिल्डिंग सिर्फ प्रदर्शन के लिए होंगे। बिल्डिंग बनाना भी जरूरी है लेकिन जब बिल्डिंग की ऊंचाई ऊपर हो जाती है तो इंसान की विचारधारा को भी उस लेवल पर लाना जरूरी है। आज बिल्डिंग की ऊंचाई तो बढ़ रही है पर इंसान का कद घट रहा है। 

ये सही डेवलपमेंट नहीं है। यह समझ कर गांव को आदर्श बनाने का काम हमें करना होगा। ऐसा गांव सिर्फ पैसे से नहीं बनेगा। अगर पैसे से गांव बनते तो टाटा-बिरला ने कितने गांव बना दिए होते। ऐसे गांव के लिए लीडरशिप चाहिए। लीडरशिप के बिना ऐसे गांव नहीं बनेंगे। गांव में लोग लीडर की तरफ देखते हैं। सुबह से शाम तक आप क्या खाते हैं? क्या पीते हैं? कहां रहते हैं? कैसे चलते हैं? कहां घूमते हैं? लोगों का ध्यान लगातार लीडर के आचरण की तरफ बना रहता है। आपको किसी ने गुटके की पुडिय़ा मुंह में डालते देखा तो आपके शब्दों का वजन खत्म। जरा भी किसी ने देखा कि बीच की उंगली में सिगरेट है और धुआं निकालते समय ऐसे राउंड में निकाल रहा है तो आपके शब्दों का वजन खत्म। बहुत संभलना पड़ेगा। मैं आपको भाषण नहीं दे रहा, कोई उपदेश नहीं दे रहा हूं। मैं जो कर रहा हूं, वह आपको बता रहा हूं। 

हमारे गांव में चाय की दुकान है। 35 साल में मुझे चाय की दुकान में बैठा हुआ किसी ने नहीं देखा होगा। इतना संभलना पड़ता है कार्यकर्ता को। मेरे कहने का मतलब यह है कि कृति और शब्द दोनों को जोडऩे वाली लीडरशिप जबतक नहीं खड़ी होगी तक तक असर नहीं आएगा। सिर्फ शब्दों से असर नहीं पड़ेगा। आज़ादी के 64 साल में कहने वाले लोगों की संख्या कम नहीं रही है। कितने अच्छे-अच्छे भाषण दिए गए लेकिन शब्दों के साथ कृति न होने से उसका असर नहीं आएगा. इसलिए कबीरदास जी कहते हैं, ‘कथनी मीठी खांड सी, करनी विष की लोय, कथनी छोड़ करनी करे, तो विष का अमृत होय।’ कथनी छोड़कर हमें करनी की तरफ बढऩा है। आदर्श गांव तब बनेगा। 

फिर वे पांच बातें आती है शुद्ध आचार, शुद्ध विचार, निष्कलंक जीवन, त्याग और अपमान सहने की क्षमता। ये सारी बातें जब जीवन में आ जाएंगी तब काम करना आसान होगा। कोई काम असंभव नहीं है। आज अन्ना हजारे आपको दिखाई दे रहा है। एक दिन मैं भी आपके जैसा सामान्य कार्यकर्ता था। मैं पैदल घूमता था, इस दफ्तर से उस दफ्तर। कभी बीडीओ दफ्तर में सिपाही बोलता कि बीडीओ अभी बैठक में हैं तो घंटा-घंटा बैठता था। मेरे कहने का मतलब है कि सामान्य कार्यकर्ता भी असामान्य कार्य कर सकता है। असंभव नहीं है। इन बातों के लिए सोचना है. 

एक मिसाल देता हूं। मेरे गांव में दलित लोगों को मंदिर में आने नहीं दिया जाता था। दलित लोगों के पीने के पानी का कुआं अलग था। सामूहिक भोज में उन्हें दूर बिठाया जाता था। गांव के दलित परिवारों पर 60 हजार रुपए बैंक का कर्जा हो गया पूरा नहीं हो रहा था। पूरे गांव के लोग बैठ गए। गांववालों ने सुझाव दिया। इसके बाद पूरे गांववाले श्रमदान करने के लिए दलितों की जमीन पर गए। सबने श्रमदान करके दलितों के खेतों में दो साल फसल उगाई और दलितों का कर्जा पूरा किया। ये है बदलाव। जिस तरह के आदर्श गांव की परिकल्पना गांधीजी करते थे, वह यह है। छुआछूत न हो, जात-पात का भेद न हो। मानव एक धर्म है। जब तक पड़ोसी के सुख-दुख में हम सहभागी नहीं होंगे तब तक बाकी सब बेकार है। खुद को कार्यकर्ता मानने वालों को इन बातों को सोचना है। 

कई कार्यकर्ता बोलते हैं, मैं तो कोशिश करता हूं पर लोग मेरी मानते ही नहीं, लोग सुनते नहीं। लोगों को दोष मत दो। लोग सुन नहीं रहे तो इसका मतलब उन पर आपके शब्दों का असर नहीं हो रहा है। असर क्यों नहीं हो रहा है? क्योंकि आपमें कोई न कोई कमी है। इसका इलाज है कि अंतर्मुखी हो जाओ। लोगों को दोष नहीं देना। सोचो कि मेरा असर क्यों नहीं हो रहा? अंतर्मुखी होकर सोचना और अपने में जो कमियां हैं उसको सुधारने का प्रयास करो। मेरे अंदर कुछ तो कमी है? चरित्र में कमी है, आचार-विचार में कुछ कमी है इसलिए लोग मेरी नहीं सुन रहे। एक दिन वह आएगा। समय लगेगा। झटपट नहीं होगा। कोई भी आप काम करते हो उसे झटपट होने की अपेक्षा नहीं करो। अगर झटपट की अपेक्षा करोगे तो कभी कभी झटपट काम हो भी जाएगा लेकिन वह स्थायी नहीं होगा। लंबे समय में जितना परिवर्तन में लाएंगे, उतना वह स्थायी रहेगा। यह सब बातों के लिए कार्यकर्ता को सोचना है।

सिटीजऩ चार्टर: अन्ना के प्रस्ताव बनाम सरकारी बिल

सरकारी कामकाज में भ्रष्टाचार की एक बड़ी शिकायत रिश्वतखोरी को लेकर है. व्यापार का लाईसेंस लेना होमकान का नक्शा पास करना होरजिस्ट्री करानी हो,बैंक से लोन लेना होपासपोर्ट अथवा ड्राविंग लाईसेंस बनवाना होराशनकार्ड,नरेगा जॉबकार्ड यहां तक कि वोटर कार्ड बनवाने में भी रिश्वत चलती है 

अन्ना हज़ारे ने  रिश्वत के बिना काम होने और  रिश्वतखोरों को दंड लगाने की व्यवस्था लोकपाल क़ानून के ही तहत बनाने का प्रावधान रखा है सरकार ने इसके लिए अलग से क़ानून बनाने के लिए बिल संसद में पेश किया है:-

क्या है दोनों प्रस्तावों में बुनियादी अंतर -

अन्ना के प्रस्ताव (जनलोकपाल कानून के तहत)
सरकार  के प्रस्ताव (जनशिकायत निवारण  के लिए अलग कानून  के तहत)
1
इस काननू के लागू होने के बाद समुचित समय सीमा मेंअधिकतम एक वर्ष के अंदर प्रत्येक लोक प्राधिकरण (पब्लिक अथॉरिटी) एक सिटीजऩ चार्टर बनाएगा
लगभग ऐसी ही व्यवस्था की गई है
2
प्रत्यके सिटीजऩ चार्टर में उस लोक प्राधिकरण द्वारा किए जाने वाले कार्यों की समय प्रतिबद्धता के बारे मेंऔर उस समय सीमा में कार्य पूरा करने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के बारे में स्पष्ट विवरण होगा
लगभग ऐसी ही व्यवस्था की गई है
3
यदि कोई लोक प्राधिकरणइस काननू के लागू होने के  एक वर्ष के अंदर सिटीजऩ चार्टर तैयार नहीं करता है तो उस प्राधिकरण से चर्चा के बादलोकपाल/लोकायुक्त स्वयं उसका सिटीजऩ चार्टर तैयार करेगा और यह उस लोक प्राधिकरण पर बाध्य होगा.
सरकारी सिटीजऩ चार्टर बिल में लोकपाल/लोकायुक्त के पास अथवा अलग से बन रहे जनशिकायत आयोग के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं है
4
प्रत्येक लोक प्राधिकरण पाने सिटीजऩ चार्टर को लागू करने के लिए आवश्यक संसाधनों का आकलन करेगा और सरकार उसे वह संसाधन उपलब्ध कराएगी
ऐसी कोई व्यवस्था ही नहीं है: अत: कोई भी विभाग संसाधन उपलब्ध न होने,
कर्मचारियों की संख्या कम होने आदि कारणों को बहाना बनाकर तय समय
सीमा में काम न करने की ज़िम्मेदारी से बचेगा.
5
प्रत्येक लोक प्राधिकरणअपने सभी केन्द्रों मेंजहां जहां भी उसके कार्यालय होंएक कर्मचारी को जनशिकायत निवारण अधिकारी  के रुप में नामित करेगी. कोई भी नागरिक सिटीजऩ चार्टर का उल्लंघन होने की स्थिति में जनशिकायत अधिकारी  के पास शिकायत कर सकेगा.
लगभग ऐसी ही व्यवस्था की गई है
6
किसी भी कार्यालय में उसका वरिष्ठतम अधिकारी जनशिकायत निवारण अधिकारी के रूप में नामित होगा.
ऐसा नहीं है
7
जनशिकायत निवारण अधिकारी का यह कर्तव्य होगा कि वह ,नागरिकों से सिटीजऩ चार्टर के उल्लंघन की शिकायतें प्राप्त करे और प्राप्ति के अधिकतम 30दिन के अंदर उनका समाधान करे.
सरकार के प्रस्ताव में जनशिकायत निवारण अधिकारी के यहां शिकायत करने पर उनकी पावती (रिसिप्ट) लेने के लिए भी दो दिन का समय रख दिया है इसका
मतलब यह हुआ कि शिकायत करने के वक्त शिकायत के काग़ज़ लेकर रख लिए जाएंगे और अगर उसे पावती चाहिए तो अगले दो दिन तक कम से कम एक चक्कर जरू़ र कटवाया जाएगा. हालांकि बिल में यथासंभव ईमले अथवा एसएमएस से भी पावती भेजने की बात कही गई है लेकिन व्यावहारिकता में एक सामान्य सरकारी दफ्तर में किसी आम आदमी को एक सामान्य आवेदन की रिसिप्ट तक नहीं दी जाती.शिकायत की पावती देने के लिए दो दिन का समय देने से शायद ही किसी को हाथों हाथ पावती मिले.

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जनशिकायत निवारण अधिकारी द्वारा 30 दिन की समय सीमा में शिकायत का निवारण नहीं किए जाने की स्थिति में विभाग के प्रमुख के पास इसकी शिकायत की जा सकती है
विभाग के प्रमुख के पास शिकायत करने की कोई प्रावधान नहीं है.
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यदि विभाग प्रमुख भी अगले30 दिन के अंदर समस्या का समाधान नहीं करता है तो इसकी शिकायत लोकपाल के न्यायिक अधिकारी के समक्ष की जा सकेगी लोकपाल प्रत्यके जिले में कम से कम एक न्यायिक अधिकारी की नियुक्ति करेगा. किसी जिले में कार्य की अधिकता को देख़ते हुए यह संख्या एक से अधिक भी हो सकती है लोकपाल द्वारा न्यायिक अधिकारी के पद पर नियुक्तियां अवकाश प्राप्त न्यायधीशअवकाश प्राप्त सरकारी अधिकारी अथवा इसी किस्म के अन्य सामान्य नागरिकों के बीच से की जाएंगी
सिटीजऩ चार्टर बिल के अनुसार जनशिकायत अधिकारी के 30दिन में शिकायत दूर न करने पर एक डेज़ीगिनेटिड अथॉरिटी के पास अपील की जाएगी. बिल में यह तो लिखा है कि यह डेज़ीगेनेटेड अथॉरिटी उस विभाग से अलग एक अधिकारी होगा. उसके पास सिविल कोर्ट की पावर भी होगी. इसका काम होगा तीस दिन में अपील का निस्तारण करना लेकिन यह कौन अधिकारी होगाक्या यह अलग से नियुक्त किया जाएगा अथवा किसी अन्य विभाग के अधिकारी को यह दायित्व दिया जा सके गा?क्या हर विभाग के लिए अलग अलग अधिकारी इसके लिए बाहर से नियुक्त किए जाएंगे. अगर नई नियुक्ति होगी तो वह किस तरह होगीकिस योग्यता के व्यक्ति की होगीइस बारे में बिल में कुछ नहीं लिखा है. इसका फ़ायदा उठाकर सरकार राजनीतिक संपर्क वाले किसी भी व्यक्ति को नियुक्त कर सकेगी. और जन शिकायत निवारण की व्यवस्था ज़िला स्तर पर राजनीतिक कृपापात्र लोगों की नियुक्ति का धंधा बन कर रह जाएगी.
यह डेज़ीगेनेटेड अथॉरिटी ज़िला स्तर पर एक होगीपूरे राज्य के लिए एक होगी अथवा हरेक विभाग में एक जन शिकायत निवारण अधिकारी के लिए अलग अलग होगी?इसका कोई ज़िक्र बिल में नहीं है.

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यदि न्यायिक अधिकारी की राय में शिकायत निवारण का कार्य उचित तरीके से नहीं हुआ है तो वहसंबद्ध पक्षों को सुनवाई का अवसर देते हुएविभाग प्रमुख सहित,शिकायत निवारण न होने के लिए जिम्मेदार अधिकारी पर जुर्माना लगाएगा,जोकि  शिकायत निवारण में हुई देरी के लिए अधिकतम 500 रुपए प्रतिदिन की दर से होगा और50,000  रुपए प्रति अधिकारी से अधिक नहीं होगा. यह राशि जिम्मेदार ठहराए गए दोशी अधिकारियों के वेतन से काटी जाएगी. यदि इस तरह के मामले में पीड़ित व्यक्ति सामाजिक अथवा आर्धिक रूप से पिछड़ा है तो दोशी अधिकारी पर ज़ुर्माने की राशि दोगुना हो जाएगी.
डेज़ीगेनेटेड अथॉरिटी के पास ज़ुर्माना लगाने का अधिकार तो है अंगे्रज़ीं भाषा में शैल इंपोज  पनेल्टी की जगह  इंपोज पनेल्टी लिखा गया है जिससे जुर्माना लगाना या न लगाना अधिकारी के विवेक पर छोड़ दिया गया है. सूचना के अधिकार के मामले में हमने देखा है कि शैल इंपोज़ पेनल्टी लिखे होने के बावजूद सूचना आयुक्त सूचना न दने  वाले अधिकारियो  पर ज़ुर्माना नहीं लगाते इसका नुकसान यह है कि अब सूचना मिलती नहीं हैसूचना आयोग का डर अधिकारियों के मन में कहीं नहीं बचा है और धीरे धीरे लोग इस क़ानून के प्रति निराश होने लगे हैं
काम होने में प्रतिदिन देरी पर ज़ुर्माना लगाने की जगह कुल मिलाकर अधिकतम 50,000रुपए तक के ज़ुर्माने का प्रावधान रखा गया है. ज़ुर्माने की राशि शिकायतकर्ता को मुआवज़े के रूप में दिलवाए जा सकने का भी प्रावधान है लेकिन सामाजिक और आर्धिक वर्ग के पिछड़े शिकायतकर्ता को दोगुना मुआवज़ा
दिलवाने अथवा ऐसे मामलों में दोशी अधिकारी पर दो गुना ज़ुर्माना लगाने का प्रावधान नहीं रखा गया है.

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लोकपाल के न्यायिक अधिकारी के भ्रष्ट होने की शिकायत लोकपाल के पास की जा सकेगी
सबसे ख़तरनाक बात है कि यह डेज़ीगेनेट अथॉरिटी किसके प्रति जवाबदेह होगासरकार के प्रति या जनशिकायत आयोग के प्रतिबिल के हिसाब से तो यह किसी के प्रति जवाबदेह ही नहीं होगा. ऐसी स्थिति में अगर यह अधिकारी ही भ्रष्ट हो जाए तो इसके खिलाफ एक्शन कौन लेगा?
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ऐसे मामलों में लोकपाल का न्यायिक अधिकारी एक समय सीमा तय करसंबंधित अधिकारी को शिकायतकर्ता की शिकायत के निवारण का आदेश भी जारी करेगा.
लगभग ऐसा ही है 
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किसी अधिकारी के खिलाफ बार बार एक ही तरह की शिकायतें आने को भ्रष्टाचार माना जाएगा.
यह व्यवस्था नहीं की गई है
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किसी अधिकारी के खिलाफ बार बार शिकायत आने की स्थिति मेंन्यायिक अधिकारी,उस  शिकायत के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को पद से हटाने अथवा उन्हें पदोवनत करने की सिफारिश लोकपाल की खंडपीठ के पास करेगा. लोकपाल की खंडपीठअधिकारियों के पक्ष की समुचित सुनवाई करते हुएसरकार को ऐसी सख्त कार्रवाई की सिफारिश करेगी.
यह व्यवस्था नहीं की गई है
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प्रत्यके लोक प्राधिकरणप्रत्यके वर्षअपने सिटीजऩ चार्टर की समीक्षा कर उसमें समुचित बदलाव करेगा. यह समीक्षालोकपाल के प्रतिनिधि की उपस्थिति मेंजन चर्चाओं के माध्यम से की जाएगी
इस बारे में स्पष्ट व्यवस्था नहीं है.
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लोकपालकिसी लोक प्राधिकरण के सिटीजऩ चार्टर में परिवर्तन हेतु आदेश जारी कर सकता है. लेकिन यह परिवर्तन लोकपाल की तीन सदस्यीय खंडपीठ से अनुमोदित कराने होंगे
इस बारे में स्पष्ट व्यवस्था नहीं है.
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संबंधित लोक प्राधिकरण,सिटीजऩ चार्टर में परिवर्तन संबंधी लोकपाल के आदेश कोऐसे आदेश की प्राप्ति के एक महीने के अंदर लागू करेगा.

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प्रत्येक न्यायिक अधिकारी के कार्य का सामाजिक अंकेक्षण प्रत्येक महीने में किया जाएगा. सामाजिक अंकेक्षण में न्यायिक अधिकारी जनता  के समक्ष प्रस्तुत होगा,अपने कार्य के संबंध में सभी तथ्य प्रस्तुत करेगा,जनता के सवालों के जवाब देगा और जनता के सुझावों को अपनी कार्य प्रणाली में शामिल करेगा. जन सुनवाई की ऐसी प्रक्रिया लोकपाल के वरिष्ठ अधिकारी की उपस्थिति में संपन्न होगी.
यह व्यवस्था नहीं की गई है
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किसी भी मामले को तब तक बंद नहीं किया जाएगा जब तक कि शिकायतकर्ता की  शिकायत का निवारण नहीं हो जाता अथवा न्यायिक अधिकारी किसी  शिकायत को खारिज नहीं कर देता.
यह व्यवस्था नहीं की गई है
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जनशिकायत आयोग की कोई आवश्यकता ही नहीं है. (वस्तुत: लोकपाल/लोकायुक्त के रहते जनशिकायत आयोग बनाकर एक तरह से आयुक्तों की भारी भरकम फौज खड़ी कर ली जाएगी. जिसकी  आवश्यकता ही नहीं है. अगर इस बिल में प्रस्तावित डेज़ीगेनेटेड अथारिटी को ही लोकपाल/लोकायुक्त के न्यायिक अधिकारी का दर्जा दे दिया जाता तो उसकी जवाबदेही भी तय हो जातीउसका बजट भी लोकपाल से आता और जनशिकायत आयोग की आवश्यकता भी न पड़ती. )
अगर डेज़ीगेनेटेड अथारिटी भी30 दिन में समस्या का निवारण नहीं करता है तो अगली अपील राज्य सरकार के मामलों में राज्य जनशिकायत आयोग एवं केंद्र सरकार के मामले में केंद्रीय जनशिकायत आयोग में की जा सकेगी. (प्रत्येक आयोग में 10 आयुक्त होंगे जो प्रमुख़त: अवकाश प्राप्त सरकारी अधिकारी अथवा न्यायधीश होंगे. इन आयोगों के लिए आयुक्तों का चयन एक बेहद कमज़ोर प्रक्रिया के तहत किया जा रहा है. संभावना है कि सरकारों में रिटायर होने वाले सचिव आदि अधिकारी सूचना आयुक्तों की तरह ही इन पदों पर भी क़ब्ज़ा जमा लें. उल्लेखनीय है कि सरकार के सिटीज़न चार्टर क़ानून में जनशिकायत आयुक्त का दर्जा मुख्य सचिव के बराबर का होगा और इसके लागू होते ही देशभर में करीब 250 पद ऐसे बनेंगे यानि एक साथ250 अवकाश  प्राप्त आइएएस अधिकारियों और न्यायधीशॉ के लिए कम से कम मुख्य सचिव स्तर की कुर्सी तो बन ही गई. और उनकी ज़िम्मेदारी के नाम पर होगी एक लचर व्यवस्था जहां सरकार खुद नहीं चाहेगी कि ये लोग कुछ काम करें) जनशिकायत आयोग के पास भी सिविल कोर्ट के अधिकार होंगे और उनके पास भी ज़ुर्माना आदि लगाने के वही अधिकार होंगे जो डेज़ीगेनेटेड अथॉरिटी को दिए गए हैं
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लोकपाल/लोकायुक्त सदस्यों के पैनल के पास सिर्फ उसके न्यायिक अधिकारी के ठीक से काम न करने की शिकायतें जाएंगी. उसका काम जनशिकायत निवारण अधिकारी के बारे में लोगों की अपील पर सुनवाई करना नहीं होगा. अत: उसके पास आने वाली शिकायतें बहुत कम रहेंगी.
अगर जनशिकायत आयोग में भी 60 दिन में राहत नहीं मिलती है तो अगली अपील लोकपाल/लोकायुक्त के पास की जा सकेगी. यहां शिकायत सुनवाई की
कोई समय सीमा तय ही नहीं की गई है. (इस तरह सारी शिकायतों  का भंडार लोकपाल/लोकायुक्त कार्यालय में जमा हो जाएगा. उनके पास कोई पर्याप्त व्यवस्था न होने के कारण वहां भी शिकायतों की सुनवाई शायद ही हो. )

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जिला ब्लॉक स्तर पर न्यायिक अधिकारी का बजट भी लोकपाल/लोकायुक्त के पास से आएगा

जनशिकायत आयोगों और डेज़ीगेनेटेड अथारिटी के बजट सरकार की मेहरबानी पर निर्भर रहेंगे. अक्सर देखा गया है कि सरकारें इन आयोगों को कमज़ोर करने के लिएजानबूझकरउन्हें पर्याप्त संख्या में कर्मचारी/अधिकारी एवं संसाधन ही नहीं उपलब्ध करातीं और इनके मुखिया संसाधनों का रोना रोते हुए काम एवं जिम्मेदारी से बचते रहते हैं


इस तरह अगर आपका किसी व्यापार के लिए लाईसेंसमकान का नक्शाड्राविंग  लाईसेंसराशनकार्डजॉब कार्डजाति प्रमाण पत्र आदि बनने में रिश्वतखोरी की शिकायत आप करना चाहते हैं तो जनलोकपाल के अनुसार आपको अधिकतम जिला स्तर तक लोकपाल के न्यायिक अधिकारी तक जाना होगा. इस तरह काम होने में अधिकतम से महीने का समय लगेगा. इतना ही नहीं अगर किसी विभाग के प्रमुख पर एक बार भी ज़ुर्माना लग गया तो वह आगे से सुनिश्चित करेगा कि उसके यहां सिटीजऩ चार्टर का पालम ठीक से हो.
लेकिन सरकार के सिटीजऩ चार्टर बिल के प्रस्तावों में आप जनशिकायत अधिकारीउसके बाद डेज़ीगेनेटेड अथॉरिटीउसके बाद जनशिकायत आयोग और उसके बाद लोकपाल/लोकायुक्त के पास जाएंगे. इसमें कम से कम एक साल का समय लगेगाऔर लोकपाल/लोकायुक्त के पास अपील की सुनवाई कब होगी यह तो भगवान ही जाने.